Friday, February 19, 2016

गुज़री हुई रात

रात यूँही गुज़र जाती है
न कोई निशान छोड़ती है पीछे
न कोई ख़्वाब बुनती है
बस आधी अधूरी सी आस में
लिपटा हुआ एक पल थमा देती है
कहती है कल फिर मिलेंगे
मुद्दतों से ऐसी ही रातें गुज़ारता हूँ मैं
2012

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