दिल तो कहता है अब तेरी जानिब
फिर कभी लौट कर नहीं आना
रूह कहती है कि खामोश रहो
नक़्श किस याद का मिटाओगे
ख़्वाब किस तौर भूल जाओगे
इश्क़ सफ़हे नहीं किताबों के
जिनको एक बार पढ़ा भूल गए
इश्क़ तो ज़ीस्त का उन्वान है
क्यूँ सुलगते हैं बिना उसके ये दिन रात कहो
क्यूँ किसी तौर उसे भूल नहीं पाते हो
रूह कहती है कि खामोश रहो
ख़्वाब के साथ ही सफ़र पे रहो
2012
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