कई दिनों से,
उदास हूँ मैं
तुम्हारी खुशबू के नरम झोंके
उदास नज़्मों के सुर्ख़ पन्ने
गुलाब रुत के वो फूल सारे
सियाह रातें, बेरंग मंज़र
समन्दरों की तमाम लहरें
बुझे बुझे से ये चाँद तारे
ये कह रहे हैं
मेरी मुहब्बत उजड़ गयी है
इसलिये तो
कई दिनों से उदास हूँ मैं
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