Thursday, June 9, 2016

बददुआ

मुझे बददुआ न दो
मैं उसी दर्द की दहलीज़ पे बिखरा हुआ हूँ
उम्र ए नौ-रंग ने जिस जा तुम्हारा नाम लिया
चराग़ ए इश्क़ जलाया था सरे शाम जहां
अब वहां कोई नहीं अजनबी कदमों के सिवा
झिलमिलाते हुए आवारा सितारों के सिवा

मैं जो ग़ुम हो गया था शहर की रंगीनियों में
तुम्हारे इश्क़ की हसरत को न समझ पाया
तो ज़ाहिर है कि ये तन्हाईयाँ जो फैली थीं
इक न इक दिन तो इन्हें मुझमें उतर जाना था
और इक रोज़ किसी दर्द की गहराई में
मिसाल ए शम्स ओ क़मर मुझको डूब जाना था
तो ख़ुदा के लिए
मुझे बददुआ न दो

8june 2016

Saturday, April 16, 2016

इक ख़त

हां मुझे इक नज़्म का मिसरा मिला है
तुम्हारी नज़्म में
उन सुनहरे आबशारों का तो कोई ज़िक्र ही न था
जो कड़े वक़्त में भी मेरी ज़बीं पर
साया करते थे
कलाई के उस कंगन का भी नाम ओ निशाँ न था
कि जिसमें उलझ कर तुम्हारी रेशमी साड़ी का पल्लू
सबा के इक इशारे पर मुझे महका सा जाता था
अपने माथे की बिंदी का भी तो तुम ज़िक्र करतीं
तुम्हारी मांग में अफ़शाँ क्या अब भी रक़्स करता है
क्या अब भी ज़िक्र ए माज़ी पर
तुम्हारी आँख में कुछ कुछ चमकता है

तुम्हारी नज़्म में कुछ बात बाक़ी थी
मैं अपनी नज़्म में तुमको मुक़म्मल कर रहा हूँ
16 Apr 2016

Sunday, March 13, 2016

चराग़ ए यादां

आज मेरे शहर ए दिल में
बारिशों का मौसम है
कुछ चराग़ ए यादां है
कुछ विसाल के लम्हे
फिर जला लिए मैंने
सोचता हूँ ऐसे में
तेरी याद का सहरा
कैसे पार करना है
सोच के दरीचों पर
कौन ख़ाक़ डालेगा
बारिशों को मौसम भी
मुझको मार डालेगा

June 2015

Tuesday, February 23, 2016

पल

कभी भी कहीं भी कैसे भी
मिल सकते हैं वो पल
जो हमने साथ गुज़ारे थे
मगर बस शर्त इतनी है
कि तुम यादों की रिमझिम बारिशों में
भीगना चाहो

Sunday, February 21, 2016

मंज़र

समंदर चुप है बहुत खामोश है आज
न कोई बात करता है
न मुझको देखता है
किनारे भी बड़े तनहा पड़े है
बड़ा मानूस मंज़र है ये सारा
बड़ी आहिस्तगी से
मेरे अंदर का मंज़र
सारे आलम पे छा गया है
2012

Friday, February 19, 2016

गुज़री हुई रात

रात यूँही गुज़र जाती है
न कोई निशान छोड़ती है पीछे
न कोई ख़्वाब बुनती है
बस आधी अधूरी सी आस में
लिपटा हुआ एक पल थमा देती है
कहती है कल फिर मिलेंगे
मुद्दतों से ऐसी ही रातें गुज़ारता हूँ मैं
2012

Thursday, February 18, 2016

ख़्वाब और मुहब्बत

उस दिन ऐसा ही मौसम था
काले बादल पूरे आकाश पे छाये थे
ठंडी ठंडी हवा के झोंके झूम रहे थे
और समंदर लहरों लहरों मचल रहा था
उस मौसम में साहिल पर एक शाम जवां थी
कोई तनहा ठंडी रेत पे टहल रहा था
गीला चेहरा बिखरे गेसू भीगी आँखें
जैसे कोई ख़्वाब मुहब्बत ढूंढ रहा हो
2011