वो जो एक बार साहिर ने कहा था
कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की हंसी छाँव में
गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
अब कहाँ वो ज़ुल्फ़ों की हंसी छाँव है
अब तो बाजार में उड़ते हैं हया के चिथड़े
अब कहाँ उसकी नज़र पर है शमा का धोख़ा
अब तो बेबस सी निगाहें है तेरी
जिनमे उठते हैं न जाने कई तूफान मगर
तुम उन्हें सबसे छुपा के खुद ही घबराती हो
अब मगर इस नए साल की आमद के वक़्त
एक नया अज़्म तुमको भी उठाना होगा
अपने दामन के राख शोलों को
फिर से उस रंग में लाना होगा
फिर से हो जाओ तुम उस आग की मानिंद कि जो
फिर कोई हाथ लगाने की तमन्ना न करे
और फिर बरसो गरजती हुई बूंदों की तरह
जिसमे धुल जाएँ सभी ज़ख्म जो दुनिया ने दिए
और फिर से वही एक नज़्म मैं दोहराता रहूँ
कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
1jan 2014
Wednesday, December 16, 2015
निर्भया के लिए
Monday, December 14, 2015
तुम्हारे इंतज़ार का मौसम
समंदर पर बिताये सुनहरी ख्वाब सारे
कहीं सूरज में जाके खो गए हैं
उन्ही ख़्वाबों में अक्सर जागना पड़ता है पहरों
जो हमने साथ मिलकर तय किये थे
उन्ही रस्तों पे चलना पड़ रहा है
बहुत तनहा मुसाफत हो गई है
इन्ही खामोशियों के साये साये
उन्ही रस्तों पे फिर से लौट आओ
तुम्हारे इंतज़ार का मौसम
कई जन्मों से
एक ही मक़ाम पर ठहरा हुआ है
2012
Tuesday, December 8, 2015
क़तरा क़तरा
आज फिर ख़्वाबों की महफ़िल में सुलगना होगा
आज फिर खुशबू की आंधी में बिखरना होगा
आज फिर भूली हुई याद के किनारों पर
बैठके क़तरा क़तरा लम्हा लम्हा
खुद को टुकड़ों में बहाना होगा
आज फिर रात की रेशम में पिघलना है मुझे
चाँद की बाँहों में सर रखके सिमटना है मुझे
आज फिर महकी हुई रात में जलना होगा
2009
Sunday, November 29, 2015
कॉफ़ी शॉप
तुम्हे कॉफ़ी शॉप में बिताई वो शाम याद है
जब हम पहली बार मिले थे
और सदियों की प्यासी धरती पर
बादल यूँ टूट के बरसे थे
जैसे मुहब्बत टूट कर होती है
हमारा सिलसिला भी उस दिन
कुछ यूँ ही शुरू हुआ था
मैं आज भी उस बारिश की तरह
टूट कर बरसता हूँ
मगर अपनी ज़मीन से बहुत दूर
2012
Thursday, November 19, 2015
वक़्त ए रुख़्सत
अलविदाई शाम के हाथों में जब
ओस की बूँद झिलमिलाई थी
मेरी आँख के सारे मंज़र
तुम्हारे हाथों की लकीरों में
क़ैद हो गए थे
2012
Wednesday, November 11, 2015
ऐ दीप आज कुछ यूँ दहको
ऐ दीप आज कुछ यूँ दहको
फूलों, ख़ुशबू की बारिश हो
हर ज़र्रा ज़र्रा महका दो
मेरे आँगन का इक इक कोना
अंगड़ाई लेकर चहक उठे
एक ईद मने दीवाली पर
सुख़न, प्रेम और जॉय, अनू
आतिश मिज़ाज सब झूम उठें
महफ़िल ए शायरी रंग में हो
ऐ दीप आज कुछ यूँ दहको
Friday, November 6, 2015
एक ख़्वाहिश
तुम नहीं आये तो हँसता हुआ चमन सारा
एक ही रात में वीरान हो गया जानां
एक गुल भी न बचा बाद ए बहाराँ न रही
ख़ाक़ उड़ती रही कोई रंग न खुशबू बाक़ी
अब तो आ जाओ कि गुलशन की ख़ैर है तुमसे
शाख़ की गुल की हवाओं की ख़ैर है तुमसे
सबसे बढ़कर मेरी सांसों की ख़ैर है तुमसे
2008