वो जो एक बार साहिर ने कहा था
कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की हंसी छाँव में
गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
अब कहाँ वो ज़ुल्फ़ों की हंसी छाँव है
अब तो बाजार में उड़ते हैं हया के चिथड़े
अब कहाँ उसकी नज़र पर है शमा का धोख़ा
अब तो बेबस सी निगाहें है तेरी
जिनमे उठते हैं न जाने कई तूफान मगर
तुम उन्हें सबसे छुपा के खुद ही घबराती हो
अब मगर इस नए साल की आमद के वक़्त
एक नया अज़्म तुमको भी उठाना होगा
अपने दामन के राख शोलों को
फिर से उस रंग में लाना होगा
फिर से हो जाओ तुम उस आग की मानिंद कि जो
फिर कोई हाथ लगाने की तमन्ना न करे
और फिर बरसो गरजती हुई बूंदों की तरह
जिसमे धुल जाएँ सभी ज़ख्म जो दुनिया ने दिए
और फिर से वही एक नज़्म मैं दोहराता रहूँ
कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
1jan 2014
Wednesday, December 16, 2015
निर्भया के लिए
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