ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल
फैली थी जहाँ पहले पहल प्यार की ख़ुशबू
उस रंग की, उसके लब ओ रुख़्सार की ख़ुशबू
फैली थी जहाँ ख़ुशबू ए दोशीज़ा ग़ज़ल चल
ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल
बिखरी थीं जहां ग़ालिब ओ मोमिन की कहानी
आई थी जहाँ दाग़ के शेरों पे जवानी
सजती थी जहाँ महफ़िल ए यारान ए सुख़न चल
ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल
एक दर्द की शम्अ थी जो बुझ बुझ के जली थी
उस चाँद की आँखों में क़यामत की नमी थी
आ फिर से बना दें वहाँ जन्नत का महल चल
ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल
दुनिया की किताबों में जो लिक्खा है मिटा दें
वो धूल जो रस्तों पे थी माथे पे सजा दें
आ फिर से लिखें एक नई दास्तान चल
ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल
July 2016
Beautiful poem, indeed! Bahot achhi bandish ban sakti hai!
ReplyDeleteक्यूँ ज़माने की उलझनों में उलझ कर रह गया
ReplyDeleteजबाब की तलाश में सवाल बन कर रह गया
ए दिल तू फिर से जी किसी के लिए मचल
ए इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल
#यूँही
बहुत ही खूबसूरत लिखा है आपने 😊
एक लफ्ज
ReplyDeleteलाजवाब
एक लफ्ज
ReplyDeleteलाजवाब