Monday, July 4, 2016

ऐ इश्क़

ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल

फैली थी जहाँ पहले पहल प्यार की ख़ुशबू
उस रंग की, उसके लब ओ रुख़्सार की ख़ुशबू
फैली थी जहाँ ख़ुशबू ए दोशीज़ा ग़ज़ल चल
ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल

बिखरी थीं जहां ग़ालिब ओ मोमिन की कहानी
आई थी जहाँ दाग़ के शेरों पे जवानी
सजती थी जहाँ महफ़िल ए यारान ए सुख़न चल
ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल

एक दर्द की शम्अ थी जो बुझ बुझ के जली थी
उस चाँद की आँखों में क़यामत की नमी थी
आ फिर से बना दें वहाँ जन्नत का महल चल
ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल

दुनिया की किताबों में जो लिक्खा है मिटा दें
वो धूल जो रस्तों पे थी माथे पे सजा दें
आ फिर से लिखें एक नई दास्तान चल
ऐ इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल

July 2016

4 comments:

  1. Beautiful poem, indeed! Bahot achhi bandish ban sakti hai!

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  2. क्यूँ ज़माने की उलझनों में उलझ कर रह गया
    जबाब की तलाश में सवाल बन कर रह गया
    ए दिल तू फिर से जी किसी के लिए मचल
    ए इश्क़ मुझे फिर से उसी राह पे ले चल
    #यूँही
    बहुत ही खूबसूरत लिखा है आपने 😊

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