Thursday, July 6, 2017

ख़ौफ़

मुझे ख़ुद से
बज़ाहिर तो कोई शिक़वा नहीं लेकिन
अजब इक ख़ौफ़ है दिल में
मुझे ऐसा क्यूँ लगता है
कि मेरे दिल के दरिया में
तुम्हारे नाम की लहरें
समाअत के किसी लम्हे में
तुम्हारे नाम लिक्खी सारी नज़्में
ख़ुद में ग़र्क ना कर लें
मेरे सरमाया ए जाँ को
मुक़म्मल मौत न दे दें
अजब इक ख़ौफ़ है दिल में
कहीं ऐसा न हो जाए

तभी शायद
मेरे लफ़्ज़ों के फूलों पर
तेरी आवाज़ की रिमझिम
बहुत दिन से नहीं उतरी

6 july 2017

Tuesday, April 11, 2017

रक़्स-ए-मुहब्बत

मेरी रग रग में
तेरी मुहब्बत का रक़्स जारी है
साँस के लम्स से हर ज़र्रा पिघलने लगा है
तेरी ख़ुशबू ए बदन से
मेरे इश्क़ का हर एक मौसम महकने लगा है
तेरे लहजे की शराब
मेरे होठों पे दहकने लगी है
तेरी ज़ुल्फ़ों की घटा
मेरे दश्त ए वीरां पे बरसने लगी है
तेरी मख़्मूर निगाहें मेरी निगाहों में
क़तरा क़तरा बिखरने लगी हैं
तेरी मुहब्बत
मेरे जिस्म में सफ़र करने लगी है

एक ख़्वाब ने दस्तक दी थी कल

Saturday, March 18, 2017

वादा

यही तो तय हुआ था ना
कि हम अब ख़ुश रहेंगे
यही वादा किया था ना
कोई मौसम भी मेरी याद का
तुम हँस के सह लेना
तो देखो
मेरी आँखों को देखो तुम
ये कितनी पुरसुकूँ हैं
मेरे होठों की गहरी मुस्कुराहट
अब नहीं छुपती
मेरे चेहरे को भी देखो
ये कितना शोख़ लगता है
अगर वादा निभाना था
तो वादा कर दिया पूरा

मगर जानाँ
फ़राग़त के किसी मौसम में
मेरी नज़्म तुम पढ़ना
तुम्हें महसूस तो होगा
कहीं लहजे का फ़ीकापन
कहीं पे दर्द का दरिया
कहीं आँसू की बौछारें
कहीं रोता हुआ नग़मा
कहीं पे हिज्र का सहरा

सुनो तुम नज़्म मत पढ़ना

2007

Friday, November 18, 2016

एक ग़ज़ल

मुझे महसूस करना हो तो कर लो
हवा के साथ बहता जा रहा हूँ

तुम्हारे हुस्न की रानाई लेकर
गुलों में रंग भरता जा रहा हूँ

मुझे अपनी रग़ों में क़ैद कर ले
तेरी हद से निकलता जा रहा हूँ

कभी जूड़े में मुझको भी सजा लो
मैं ख़ुशबू हूँ बिखरता जा रहा हूँ

सदा ख़ामोश लम्हों की सुनोगे
सो ख़ामोशी में ढलता जा रहा हूँ

Tuesday, September 27, 2016

तुम और मैं

तुम और मैं
सितारों की तरह हैं
जिनमें बज़ाहिर तो कोई फ़ासला नहीं होता
पर हक़ीक़तन
हज़ारों सालों की दूरियाँ होती हैं
तुम और मैं
हां तुम और मैं
उन्हीं सितारों की तरह हैं

27 Sep 2016

Friday, September 16, 2016

तुमने पूछा था

तुमने कल फ़ोन किया था
और पूछा था ना
कि तुम कैसे हो
तो सुनो

तुमने उस पेड़ को देखा है
जो बारिश की चाह में
दिन रात जलता है
वो आवारा बादलों को
यूँ तकता है मानो
वो बरस पड़ेंगे
मैं वैसा हूँ

तुमने उस दरिया को देखा है
जो समन्दर की चाह में
न जाने कितने हज़ार मील का सफ़र करता है
और हिज्र की लम्बी घड़ियां बिताता है
और सूख जाता है
मैं वैसा हूँ

तुमने वो रात तो महसूस की होगी
दर्द में सिमटी घुलती हुई रात
जब चाँद भी न निकले
कोई आवारा सड़कों पर
उदास नग़मा छेड़ दे
और नींद न आए
मैं वैसा हूँ

तुमने पूछा था ना
कि मैं कैसा हूँ

16 sep 2016

Sunday, September 11, 2016

हद

मैं तुम्हें भूलने की आख़िरी हदों में हूँ
तो यूँ करना
मुझे अब दर्द मत देना
मेरी साँसों में मत बहना
मुझे महसूस मत करना
मुझे एहसास की शिद्दत से ज़्यादा चाहने का जुर्म मत करना
ये आँखें ख़ून रोएँगी

मैं तुम्हें भूलने की आख़िरी हदों में हूँ
तो यूँ करना
मुझे आवाज़ मत देना
सुलगती रात में जब चाँदनी तुमको जला डाले
मुझे आवाज़ मत देना
वो दरिया गर कभी आवाज़ दे तो
तुम मुकर जाना
मुझे मुहब्बत की दास्ताँ से निकाल देना

10 sep 2016