विसाल ओ हिज्र की हद से गुजरना चाहा था
मेरी ग़ज़ल ने अभी रुख़ बदलना चाहा था
ये कौन है जो शहीदों में ज़िक्र करता है
हमारे इश्क़ ने गुमनाम मरना चाहा था
तुम्हारी शबनमी रातों में उजालों के लिए
बस इक चराग़ की मानिंद जलना चाहा था
सुबह की सेज पे जब धूप ने ली अंगड़ाई
सो आफ़ताब को आगोश करना चाहा था
तुम्हारे हिज्र ने क्या क्या न रँग दिखलाए
शब ए फ़िराक़ में सौ बार मरना चाहा था
तेरी तस्वीर बनाए नहीं बनती मुझसे
हरेक रँग ने तुझमें उतरना चाहा था
ख़ुदा रक़ीबों को हर गाम सलामत रक्खे
मुझे गिरा के उन्होंने सँभलना चाहा था
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