कल शब चाँद को देखा मैंने
डूबा डूबा सहमा सहमा
बिखरा बिखरा तनहा तनहा
रोती आँखें भीगा मंज़र
उसकी जागती आँखों में
तस्वीर थी कोई धुंधली सी
मैंने ग़ौर से देखा उसको
कोई मंज़र पहचाना सा सामने आया
जैसे उसकी आँखों में कोई जलता हो
मैंने पूछा चाँद से इतने तनहा क्यों हो
वो बोला सब इश्क़ का हासिल
ये उदास शामों का खूंरेज़ मंज़र
ये तनहा शबों में भटकना हमेशा
बे वजह नहीं है
मुहब्बत यही है
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