Friday, December 7, 2018

ग़ज़ल

याद ए माज़ी के वरक़ और सितम ख़ुशबू का
बारहा देखा है हमने ये करम ख़ुशबू का

शब ए तन्हाई में यादों की किरन बिखरे तो
चाँद लगता है तरफ़दार सनम ख़ुशबू का

तुम्हारी आहटों की मुन्तज़िर शामों की गलियों में
टूटता है मिसाल ए अश्क़ भरम ख़ुशबू का

बाग़ में इस क़दर फूलों को न तकते रहना
गर्मी ए शौक़, निकल जाए न दम ख़ुशबू का

शाम होती है तो दिल डूबने लगता है कहीं
ज़ीस्त पे तारी है अफ़साना ए ग़म ख़ुशबू का

सुर्ख़ डोरों में क़यामत का हश्र बरपा है
तुमने देखा है कभी दीद ए नम ख़ुशबू का

- सुख़नवर

ग़ज़ल

वो बारिशों का हसीन मंज़र, तुम्हारी नज़रें झुकी झुकी सी
वो मेरा लहजा नया नया सा, तुम्हारी साँसें रुकी रुकी सी

उदास शामों की नर्मियों में वो सर्द रातों की सिलवटों में
तुम्हारी आहट की मुन्तज़िर हैं हमारी धड़कन थमी थमी सी

ज़मीन ए दिल पर चराग़ लम्हों का शामियाना बिछा रही हैं
तुम्हारी नज़रों की बेक़रारी, वो मुस्कुराहट दबी दबी सी

समाअतों में गूँजते है अभी तलक वो विसाल मौसम
तुम्हारी आवाज़ के नर्म साये, तुम्हारी सूरत खिली खिली सी

चलो कहीं और चल के बैठें, जगाएं सोई रुतों को जानाँ
पुकारती हैं तुम्हारे क़दमों को शाहराहें मिटी मिटी सी

गुलाब मौसम में साहिलों पर तुम्हारे हमराह चलते रहना
वो नज़्म लिखना तुम्हें सुनाना, है एक ख़्वाहिश दबी दबी सी

- सुख़नवर

ग़ज़ल

फ़िराक़ लम्हों में दिल की शमां जलाते हुए
संभल रहे थे अबस हम फ़रेब खाते हुए

इश्क़ लम्हों में हुईं चाँद से बातें अक्सर
हुई हैं नज़्म कई यूँही गुनगुनाते हुए

मिली थी रास्ते में इक सुनहरी शाम हमें
तुम्हारे शहर की गलियों से अबके जाते हुए

पड़ा है दाग़ के और फ़ैज़ के अंदाज़ से पाला
ग़ज़ल रस्तों पे नए रंग आज़माते हुए

तमाम रात मेरी तिश्नगी उदास रही
इक नदी सूख चली थी यूँही बलखाते हुए

उन्हीं बेदर्द किस्सों में हमारे हिज्र की बातें
बिखर गई थी वो एक दास्ताँ सुनाते हुए

अब कहाँ जाएँ तेरी याद से वाबस्ता क़दम
दयार ए हिज्र में हर गाम लड़खड़ाते हुए

- सुख़नवर

Monday, October 22, 2018

तर्क़ ए तअल्लुक़

हमने देखा है वो एक रब्त ए शनसाई भी
जब तेरी आँख ने झुककर ये कहा था मुझसे
और कुछ देर ज़रा बैठो फिर चले जाना

वगरना रात ये ख़ामोश, ढल न पाएगी
जो तीरगी मेरी आगोश में फैली है सुनो,
वो लम्हा लम्हा मुक़द्दर पे फैल जाएगी
और कुछ देर ज़रा बैठो फिर चले जाना

अभी क़रार मेरे दिल को ज़रा आना है
अभी तो रोशनी होगी चराग़ दहकेंगे
अभी तो चाँद निकलने में वक़्त है थोड़ा
अभी तो चाँदनी बिखरायेगी महताब का नूर
फिर उसके बाद मेरे ज़ख़्म पर मरहम रखना
और कुछ देर ज़रा बैठो फिर चले जाना

वो देखो कल ही शाख़ पर गुलाब आया है
तुम्हें पसन्द है ना
वो देखो सहन में अनार के दरख़्त पर
नई कलियां खिली हैं
वो देखो क्यारियों में अनगिनत तितली महकती हैं
वो कोयल गीत गाती है, वो चिड़िया चहचहाती हैं
और कुछ देर ज़रा ठहरो फिर चले जाना

वो देखो आसमां के आख़िरी किनारे पर
उन सितारों को देखो तुम
हमेशा साथ रहते हैं, मगर ये मिल नहीं पाते
हमेशा हिज्र में सिमटे तवाफ़ करते हैं
ये मिलना चाहते होंगे मगर उनकी भी दुनिया में
रवायत ओ रिवाज़ों की कड़ी ज़ंजीर के साये
उन्हें जकड़े हुए होंगे
और कुछ देर ज़रा ठहरो फिर चले जाना

"बहुत सा दर्द है दिल में जो कहना चाहती हो तुम"
मेरा सवाल अचानक था, सो रुक गई थीं तुम
तुम्हारी बेबसी आँखों में छलक आई थी
मैं जानता था तुम्हारी फ़िज़ूल बातों को
तुम्हारे चाँद के क़िस्से, गुलाब रातों को
तुम अपने हिज्र के लम्हों को गिन रही थीं ना
मैं अपनी ज़ात की सब किरचियाँ संभाले हुए
फ़िराक़ रस्तों के बेनाम सफ़र पर तन्हा
भटक रहा हूँ इक मिस्ल ए आरज़ू ए सराब

Friday, March 23, 2018

ग़ज़ल

शाख़ पे फिर वो मुस्कुराया है
वस्ल का दिन क़रीब आया है

आज फिर नज़्म कोई छेड़ी है
सारे आलम पे तू ही छाया है

मुझसे पहलू बचा के चलता है
कितना बेदर्द तेरा साया है

ख़ामोशी इख़्तियार क्यूँ कर ली
जाँ निसारी का वक़्त आया है

साहिर ओ फ़ैज़ की दो चार किताब
अब यही कुल मेरा सरमाया है

कितने यारों का कर्ज़ बाक़ी है
किसकी जानिब से संग आया है

इक तमन्ना सवाल करती है
दूर कितना है जो पराया है

Wednesday, December 27, 2017

मुहब्बत की आख़िरी शाम

मुहब्बत की वो आख़िरी शाम
तुम्हारी मुन्तज़िर आँखें
सुलगते होंठ आतिशी रुख़सार
मुंडेरों पर लटकती फूल की शाखें
महकता जिस्म बिखरते गेसू
लाल रंगों में नहाई हुई तुम
और हद दर्ज़ा बिखरता हुआ मैं
मेरी बाहों में समाई हुई तुम
और हर आन लरज़ता हुआ मैं
तेरी आँखों से बरसते वो शबनमी आँसू
अपनी आहों के अलाव में सुलगता हुआ मैं
लफ़्ज़ दर लफ़्ज़ ख़त्म होती वो कहानी भी
साँस दर साँस ख़त्म होती ज़िंदगानी भी

साल दर साल बिछड़ना था जिसके दामन में
वो शाम
ऐसा ही इक रिश्ता छोड़ गई थी हमारे दरमियाँ
जिसकी डोर थामे हुए
जाने कितने जन्मों का हिज्र काटना है मुझे
अगर मुमकिन हो
मेरी सज़ा मुख़्तसर कर दो
अगर मुमकिन हो

Friday, December 1, 2017

आलम ए तन्हाई

आज फिर कूचा ए जानाँ में रक़्स करता हुआ
एक आवारा मुसाफ़िर की तरह गुज़रा है
वो एक नाम पशेमाँ हुआ था जिसपे तू
वो एक रंग जो गालों पे कभी उभरा था
वो हमकलाम तेरा, नक़्श ए जबीं था जो कभी
जो तेरे दिल की रियासत का शाहज़ादा था
तेरी ख़ुशबू से बंधा था कि जिसका हर लम्हा
तेरी तवीलतर रातों का इक सितारा था
जो तेरे बाग़ में खिलता था फूल की सूरत
बिखर गया है वो सूखे गुलाब की तरह
जो चाहतों का तेरी इक अकेला मरकज़ था
लुटा चुका है वो सरमाया ए जाँ तेरी ख़ातिर

वो जो इक वक़्त में महफ़िल की जान होता था
वो तेरे बाद बहुत कम किसी से मिलता है
अब उसे फ़र्क़ कहाँ कब किसी से पड़ता है
कि उसके पास बचा कोई नहीं कोई नहीं
वादी ए इश्क़ में मिस्ल ए ग़ुबार उड़ता है
वो जिसका तेरे सिवा कोई नहीं कोई नहीं